About Us: Sanatan Puja Seva

Bridging Tradition with Technology
Welcome to Sanatan Puja Seva, your trusted partner in performing Vedic rituals with devotion, authenticity, and ease. In today’s fast-paced world, finding a knowledgeable Pandit and sourcing authentic Samagri can be challenging. We are here to bridge that gap, ensuring that your spiritual journey remains seamless and sacred.

हमारे बारे में: सनातन पूजा सेवा
परंपरा और आधुनिकता का संगम
सनातन पूजा सेवा में आपका स्वागत है। हम वैदिक रीति-रिवाजों को पूरी श्रद्धा, प्रामाणिकता और सुगमता के साथ संपन्न कराने में आपके विश्वसनीय साथी हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, एक विद्वान पंडित की खोज और शुद्ध पूजन सामग्री जुटाना एक कठिन कार्य हो सकता है। हमारा उद्देश्य इस दूरी को मिटाना है ताकि आपकी आध्यात्मिक यात्रा निर्बाध और पवित्र बनी रहे।

हमारा लक्ष्य


हमारा लक्ष्य सनातन धर्म की कालजयी परंपराओं को संरक्षित करना और वैदिक अनुष्ठानों को हर व्यक्ति के लिए सुलभ बनाना है। हम शास्त्रोक्त विधि से किए गए अनुष्ठानों के माध्यम से आपके घर और कार्यस्थल पर ईश्वरीय आशीर्वाद पहुँचाने के लिए समर्पित हैं।

हमारी विशेषताएँ

अनुभवी एवं प्रमाणित पंडित: हम केवल उन्हीं विद्वान पुरोहितों के साथ काम करते हैं जिन्हें वेदों और शास्त्रों का गहन ज्ञान है।
पूर्ण प्रबंधन: पूजन सामग्री से लेकर शुभ मुहूर्त की गणना तक, हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी हमारी होती है।
व्यक्तिगत सेवा: चाहे वह छोटी सी ‘गृह शांति’ हो या भव्य ‘विवाह संस्कार’, हम आपकी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार सेवा प्रदान करते हैं।
ई-पूजा सुविधा: हमारे माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में बैठा भक्त भारत के पवित्र तीर्थ स्थलों पर पूजा संपन्न करा सकता है और प्रसाद प्राप्त कर सकता है।

हमारी यात्रा

‘सेवा’ और ‘भक्ति’ के सिद्धांतों पर आधारित, सनातन पूजा सेवा की शुरुआत स्थानीय स्तर पर भक्तों की मदद के लिए की गई थी। आज, अपने बड़ों के आशीर्वाद और आधुनिक तकनीक के समन्वय से, हम हजारों परिवारों को उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं में सहयोग कर रहे हैं।

Our Services

नीचे सनातन परंपरा के अनुसार पूजा की श्रेणियाँ (Category of Puja) केवल हिंदी में स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में दी गई हैं।

नैमित्तिक पूजा

नैमित्तिक पूजा वह पूजा है जो किसी विशेष अवसर, पर्व या निमित्त (कारण) के लिए की जाती है, जैसे नवरात्रि, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, पितृपक्ष या दिवाली जैसे त्योहारों पर की जाने वाली पूजाएँ, जिसमें देवी-देवताओं का आवाहन, ध्यान, भोग और आरती आदि शामिल होते हैं, जिसके फल जल्दी मिलते हैं और यह नित्य पूजा से अलग होती है।

नैमित्तिक पूजा के उदाहरण:
पर्व-त्योहार: नवरात्रि, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, दीपावली, होली।
पितृपक्ष: पूर्वजों की शांति के लिए की जाने वाली पूजा।

विशेष अनुष्ठान: किसी विशेष मनोकामना पूर्ति या किसी खास देवता को प्रसन्न करने के लिए विशेष दिनों पर की जाने वाली पूजा (जैसे गणेश चतुर्थी पर गणेश पूजा)।

नैमित्तिक पूजा की विशेषताएँ:

उद्देश्य: यह किसी विशेष उद्देश्य या अवसर से प्रेरित होती है।
समय: यह रोज़ाना नहीं, बल्कि विशिष्ट तिथियों या अवसरों पर की जाती है।
फल: इसका फल नित्य पूजा की तुलना में जल्दी (लगभग एक महीने में) प्राप्त होता है।
संक्षेप में, जब आप किसी खास दिन (जैसे शिवरात्रि) या किसी खास वजह (जैसे संतान प्राप्ति के लिए) से कोई पूजा करते हैं, तो वह नैमित्तिक पूजा कहलाती है।

काम्य पूजा

काम्य पूजा (Kamya Puja) एक विशेष उद्देश्य या मनोकामना, जैसे संतान प्राप्ति, धन वृद्धि, या विवाह, को पूरा करने के लिए की जाने वाली पूजा है, जिसमें भक्त अपनी इच्छा पूरी करने हेतु विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, और जप करते हैं, जैसे दशरथ द्वारा की गई पुत्रकामेष्टि यज्ञ इसी का उदाहरण है. यह नित्य (दैनिक) और नैमित्तिक (कभी-कभी होने वाली) पूजा से भिन्न होती है क्योंकि इसका संबंध किसी विशिष्ट फल की प्राप्ति से होता है

काम्य पूजा की मुख्य विशेषताएँ:

उद्देश्य-केंद्रित: यह किसी खास फल की इच्छा से की जाती है, जैसे अच्छी नौकरी, स्वास्थ्य, या सुख-समृद्धि

विशिष्ट अनुष्ठान: इसमें मंत्रोच्चार, हवन, जप, और अन्य कर्मकांड शामिल होते हैं, जो उस मनोकामना के लिए विशेष रूप से किए जाते हैं
उदाहरण: पुत्रकामेष्टि यज्ञ (संतान प्राप्ति के लिए), वर्षा के लिए यज्ञ, या धन और समृद्धि के लिए लक्ष्मी पूजा काम्य पूजा के उदाहरण हैं

शैव धर्म में: शैवागमों में काम्य पूजा को परार्थ पूजा (सभी के लिए की जाने वाली पूजा) के तीन प्रकारों में से एक माना गया है, जहाँ भक्त विशिष्ट परिणामों के लिए देवताओं की आराधना करते हैं.
संक्षेप में, जब आप किसी विशेष इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान से प्रार्थना करते हुए कोई पूजा-पाठ करते हैं, तो वह काम्य पूजा कहलाती है, जो फल की प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है.

शांति पूजा

शांति पूजा (Shanti Puja) एक व्यापक अनुष्ठान है जिसमें कई प्रकार की पूजाएँ शामिल होती हैं, जैसे ग्रह शांति पूजा (नवग्रहों को प्रसन्न करने के लिए), वास्तु शांति पूजा (घर और भूमि के दोष दूर करने के लिए), नक्षत्र शांति पूजा (जन्म नक्षत्र के दोष निवारण हेतु), और मृत्यु पश्चात शांति पूजा (दिवंगत आत्मा की शांति के लिए), जिनमें गणेश पूजा, कलश स्थापना, हवन (रुद्र, पुरुष, श्री सूक्त) और विशिष्ट ग्रहों या देवताओं के मंत्रों का जाप प्रमुखता से किया जाता है, ताकि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आए।

शांति पूजा के मुख्य प्रकार और उनमें शामिल पूजाएँ:
गृह शांति पूजा / वास्तु शांति पूजा:

उद्देश्य: घर और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा लाना, नकारात्मकता दूर करना, और सुख-शांति स्थापित करना।
शामिल पूजाएँ: गणेश गौरी पूजन, नवग्रह मंडल पूजन, सर्वतोभद्र मंडल पूजन, कलश पूजन, रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, श्रीसूक्त हवन, और वास्तुपुरुष की पूजा।

ग्रह शांति पूजा:

उद्देश्य: ग्रहों के अशुभ प्रभावों को शांत करना और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करना।
शामिल पूजाएँ: नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु) के मंत्रों का जाप और हवन (जैसे शनि शांति, मंगल शांति मंत्र)।

नक्षत्र शांति पूजा:
उद्देश्य: जन्म नक्षत्र के दोषों को दूर करना और कल्याण प्राप्त करना।

शामिल पूजाएँ: नक्षत्र शांति मंत्रों का जाप, हवन, कलश स्थापना, और दान-दक्षिणा।

मृत्यु पश्चात शांति पूजा (श्राद्ध/शुद्धिकरण):

उद्देश्य: मृतक की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए।
शामिल पूजाएँ: गरुड़ पुराण का पाठ (13 दिनों तक), शांति पाठ।

सामान्यतः सभी शांति पूजाओं में शामिल प्रमुख तत्व:
संकल्प: पूजा शुरू करने से पहले संकल्प लिया जाता है।

स्थान शुद्धि: गंगाजल आदि से स्थान को शुद्ध किया जाता है।

कलश स्थापना: देवताओं और ग्रहों का आह्वान करने के लिए कलश स्थापित किया जाता है।
मंत्रोच्चारण: वैदिक मंत्रों और विशिष्ट शांति मंत्रों का जाप होता है।
हवन: विभिन्न देवताओं और ग्रहों के लिए आहुतियाँ दी जाती हैं।
दान: ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को दान दिया जाता है।
संक्षेप में, शांति पूजा एक व्यापक अनुष्ठान है जो विभिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी पूजाओं और हवन का एक संयोजन है, जिसका लक्ष्य व्यक्ति के जीवन और आसपास के वातावरण में शांति,
सद्भाव और सकारात्मकता लाना है।

वैवाहिक दोष निवारण
मांगलिक दोष निवारण
गुरु चांडाल दोष निवारण
सूर्य ग्रहण दोष निवारण
वंश वृद्धि योग पूजा
मारक दोष निवारण

पितृदोष निबारण

पितृ पूजा


पितृ पूजा में पिंड दान एक महत्वपूर्ण कर्मकांड है, जिसमें चावल या जौ के आटे से बने गोल पिंडों (पूतलों) को जल, दूध, शहद, तिल आदि के साथ पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें तृप्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है, खासकर पितृपक्ष, श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध के दौरान इसका विशेष महत्व है, और गया जैसे तीर्थ स्थानों पर यह प्रमुखता से किया जाता है.
पिंड दान का महत्व:
मोक्ष प्राप्ति: यह मृत पूर्वजों को मोक्ष दिलाने और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का एक तरीका है.
संतुष्टि: इससे पितृ संतुष्ट होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.
श्राद्ध का अंग: यह श्राद्ध और तर्पण का एक अभिन्न अंग है.
पिंड दान की आवश्यक सामग्री (सामान्य):
चावल, जौ या गेहूं का आटा.
पानी, दूध, शहद, काले तिल.
कुश घास, फूल, फल.
गंगाजल, दीया, अगरबत्ती.
पिंड दान की विधि (संक्षेप में):
स्नान व शुद्धिकरण: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें.
दिशा और आसन: पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें.
पिंड बनाना: आटे में जल, दूध, शहद और तिल मिलाकर पिंड (पूतला) बनाएं.
अर्पण: इन पिंडों को कुश और फूलों के साथ पितरों का स्मरण करते हुए अर्पित करें.
तर्पण: जल में काले तिल मिलाकर पितरों को जल अर्पित करें (तर्पण).
दान: सामर्थ्य अनुसार भोजन, वस्त्र, भूमि या अन्य वस्तुएं दान करें, खासकर पितृपक्ष में.
कहाँ करें:
पिंडदान घर पर या किसी पवित्र तीर्थ स्थल जैसे गया में फल्गु नदी के किनारे किया जा सकता है, जहाँ भगवान राम ने भी पिंडदान किया था.
कब करें:
पितृपक्ष (भाद्रपद मास), मासिक श्राद्ध, वार्षिक श्राद्ध, और किसी भी अमावस्या के दिन.
यह कर्मकांड श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर पितरों को शांति और परिवार को आशीर्वाद मिलता है.

पार्वण श्राद्ध – अमावस्या या पर्व पर सभी पितरों के लिए सामूहिक तर्पण।
सपिंडन श्राद्ध – मृत्यु के 12वें दिन पितरों से मिलन के लिए।
सांवत्सरिक या वार्षिक श्राद्ध – जो पुण्यतिथि पर होता है।
मातृ नवमी श्राद्ध – सौभाग्यवती स्त्रियों (माताओं) के लिए।
चतुर्दशी श्राद्ध – अकाल मृत्यु (दुर्घटना, शस्त्र) से मृत पितरों के लिए।
सर्वपित्रु अमावस्या – सभी पितरों के लिए, विशेषकर जिनका श्राद्ध भूल गए हों।
त्रिपिंडी श्राद्ध गया जी – यह उन पितरों के लिए किया जाता है जो तीन वर्षों से अतृप्त हैं, या जिनकी मृत्यु असामान्य कारणों से हुई हो, उन्हें शांत करने के लिए।
महत्व: संतान प्राप्ति में बाधा, बुरी नज़र और पितरों के क्रोध से मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण।
नारायण बलि श्राद्ध – विशेष रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु अकाल मृत्यु (जैसे दुर्घटना, आत्महत्या) से हुई हो, ताकि उनकी आत्मा प्रेत योनि से मुक्त हो सके।

हवन / यज्ञ पूजा

हिन्दू धर्म में हवन या यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक शुद्धि, पर्यावरण संरक्षण और ईश्वर के प्रति समर्पण का एक वैज्ञानिक तरीका भी है। ‘यज्ञ’ शब्द संस्कृत की ‘यज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है—देवपूजा, दान और संगतिकरण।
यहाँ हवन और यज्ञ का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. यज्ञ और हवन में अंतर
अक्सर लोग इन दोनों को एक ही मानते हैं, लेकिन सूक्ष्म अंतर है:
हवन: यह एक छोटा रूप है। इसमें मंत्रों के साथ अग्नि में आहुति दी जाती है। यह दैनिक या विशेष अवसरों पर घर में किया जा सकता है।
यज्ञ: यह एक व्यापक अनुष्ठान है। इसमें बड़े स्तर पर देवताओं का आह्वान, विशिष्ट उद्देश्य (जैसे वर्षा, शांति, या लोक कल्याण) और अधिक संख्या में ऋत्विक (पंडित) शामिल होते हैं।

2. हवन की मुख्य सामग्री (Samyagri)
हवन के लिए चार प्रकार की सामग्रियों का मिश्रण तैयार किया जाता है:
सुगंधित: कस्तूरी, केसर, अगर-तगर, चंदन।
पुष्टिकारक (Health): घी, दूध, फल, मेवे, अनाज।
मिष्ट (Sweet): गुड़, शहद, शक्कर।
रोगनाशक: गिलोय, गुग्गल, लोबान, कपूर, नीम की पत्तियां।
समिधा (लकड़ी): मुख्य रूप से आम, पलाश, शमी, पीपल या चंदन की सूखी लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।

3. हवन की प्रक्रिया (Step-by-Step)
एक मानक हवन विधि में निम्नलिखित चरण होते हैं:
चरण
विवरण
पवित्रीकरण
जल के छिड़काव से स्वयं को और स्थान को शुद्ध करना।
आचमन
तीन बार जल पीना (मन, वाणी और कर्म की शुद्धि के लिए)।
संकल्प
हाथ में जल लेकर अपना नाम, गोत्र और पूजन का उद्देश्य बोलना।
अग्नि प्रज्वलन
कपूर या रुई की बाती से ‘अग्नि’ देव को जागृत करना।
आहुति
मुख्य मंत्रों (जैसे गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र) के साथ ‘स्वाहा’ बोलकर सामग्री अग्नि में डालना।
पूर्णाहुति
नारियल और घी की अंतिम आहुति, जो यज्ञ की समाप्ति का प्रतीक है।
आरती व क्षमा प्रार्थना
अंत में आरती करना और अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगना।

4. हवन का महत्व और लाभ
आध्यात्मिक लाभ
देव प्रसन्नता: अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है। अग्नि में दी गई आहुति सीधे देवताओं तक पहुँचती है।
सकारात्मक ऊर्जा: मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें घर से नकारात्मकता को दूर करती हैं।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय लाभ
वायु शोधन: घी और जड़ी-बूटियों के जलने से निकलने वाला धुआं हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है।
वर्षा में सहायक: यज्ञ के धुएं से बादलों के निर्माण में सहायता मिलती है (प्राचीन मान्यताओं और कुछ शोधों के अनुसार)।
मानसिक शांति: हवन के धुएं से निकलने वाली सुगंध तनाव कम करती है और मस्तिष्क को शांत रखती है।

5. प्रमुख मंत्र
हवन के दौरान सबसे महत्वपूर्ण शब्द है “स्वाहा”। इसका अर्थ है—”सही रीति से पहुँचाना”। बिना स्वाहा कहे आहुति स्वीकार नहीं की जाती।
गायत्री मंत्र: $ॐ\ भूर्भुवः\ स्वः\ तत्सवितुर्वरेण्यं\ भर्गो\ देवस्य\ धीमहि\ धियो\ यो\ नः\ प्रचोदयात्\ ॥$
महामृत्युंजय मंत्र: स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए।

अभिषेक एवं अर्चना पूजा


अभिषेक पूजा (मुख्यतः रुद्राभिषेक) में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत) जैसी पवित्र चीज़ों से स्नान कराया जाता है, साथ में ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्रों का जाप होता है और गणेश जी, दुर्गा जी, नवग्रहों सहित अन्य देवताओं की भी पूजा होती है, जिसका उद्देश्य पापों से मुक्ति, स्वास्थ्य और समृद्धि पाना है।

अभिषेक पूजा में शामिल मुख्य प्रक्रियाएँ:

संकल्प और गणेश पूजा: पूजा शुरू करने से पहले हाथ में जल और फूल लेकर संकल्प लिया जाता है और भगवान गणेश का आह्वान कर पूजा की अनुमति मांगी जाती है।

रुद्र मंत्रों का जाप: यजुर्वेद के ‘रुद्र’ अध्याय के मंत्रों (जैसे ‘ॐ नमः शिवाय’ और महामृत्युंजय मंत्र) का जाप किया जाता है।
पवित्र द्रव्यों से स्नान (अभिषेक): शिवलिंग पर एक-एक करके कई पवित्र वस्तुओं से लगातार जलधारा छोड़ी जाती है।
जल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत)
अन्य पदार्थ: चंदन, भस्म (विभूति), अक्षत, बेलपत्र, फल, तिल का तेल, गुलाब जल आदि भी उपयोग होते हैं।
अन्य देवताओं की पूजा: इस दौरान पृथ्वी माता, गंगा माता, सूर्य, लक्ष्मी, अग्नि, ब्रह्मा, नवग्रह और अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा की जाती है।

शृंगार और आरती: अभिषेक के बाद शिवलिंग को चंदन, भस्म से सजाकर कपूर से आरती की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है।
अभिषेक के मुख्य प्रकार (रुद्राभिषेक के संदर्भ में):
जल अभिषेक: शुद्ध जल से स्नान।
दुग्धाभिषेक: दूध से।
दधि अभिषेक: दही से।
घृत अभिषेक: घी से।
शहद अभिषेक: शहद से।
पंचामृत अभिषेक: दूध, दही, घी, शहद, शक्कर के मिश्रण से।
यह एक विस्तृत पूजा है जो शिवजी को प्रसन्न करने और जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए की जाती है।

Acharya Vikash Bhahman

हमारे आध्यात्मिक मार्गदर्शक और संस्थापक चित्र में हमारे संस्थापक को पारंपरिक केसरिया वस्त्रों में देखा जा सकता है, जो त्याग और आध्यात्मिक सेवा का प्रतीक है । उनके माथे पर तिलक उनके अनुशासन और सनातन पूजा सेवा जैसे मंच का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक भक्ति को दर्शाता है । उनके मार्गदर्शन में, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक अनुष्ठान शास्त्रीय सटीकता और सच्ची आध्यात्मिक भावना के साथ संपन्न हो।


दृष्टिकोण (Vision): हर घर में वैदिक अनुष्ठानों की पवित्रता पहुँचाना।
प्रतिबद्धता: पूजन सामग्री और मंत्र-उच्चारण में शुद्धता के उच्चतम मानकों को बनाए रखना।

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